Wednesday, November 14, 2007

राहुल गांधी को पता चल गया होगा कि उत्तर प्रदेश में असली मुश्किल क्या है

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी फिर कुछ खास नहीं कर पाई। फिर कुछ कास इसलिए कहना पड़ता है कि पिछले 18 साल से राज्य में पार्टी का हाल कुछ ऐसा ही है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की तरफ से खास ये हुआ कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में कमान सौंपने के साफ संकेत दे दिए। राहुल ने जमकर मेहनत भी की। लेकिन, कोई जमीनी आधार न बचा होने से इसका परिणाम कुछ नहीं निकला।
अब लोकसभा चुनाव के पहले सोनिया ने एक बार फिर से राहुल गांधी को और मजबूत करके उत्तर प्रदेश से ज्यादा से ज्यादा कांग्रेसी संसद में भेजने का जिम्मा सौंप दिया है। राहुल गांधी को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के महासचिव के साथ ही छात्र और युवा संगठन का जिम्मा दिया गया है। राहुल के साथ के लिए कई नौजवानों को उनके साथ लगाया गया है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में असली मुश्किल क्या है ये राहुल गांधी को कांग्रेस महासचिव बनने के बाद अपनी पहली सांगठनिक यात्रा में ही पता चल गया।
सोमवार को राहुल गांधी लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। दिल्ली से उनके साथ उत्तर प्रदेश के नए-नवेले प्रभारी दिग्विजय सिंह थे। तो, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नई-नवेली अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी लखनऊ में पूरे जोश के साथ उनके स्वागत के लिए थीं। प्रेस कांफ्रेंस शुरू होते ही पत्रकारों ने सवालों की बौछार शुरू की तो, कभी माइक बॉक्स प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी अपनी तरफ खींचकर जवाब देने लगतीं तो, कभी प्रदेश प्रभारी राहुल बाबा को बचाने में अपने वाक कौशल का इस्तेमाल करने लगते।
इसी बीच किसी पत्रकार ने कह दिया कि राहुल गांधी को बोलना नहीं आता क्या। सवाल तो, उन्हीं से किए जा रहे हैं। खिसियाए राहुल ने माइक लेकर कहा कि आप लोगों को क्या लगता है कि मुझे बोलना नहीं आता। अब मैं आप लोगों को बोलकर दिखाता हूं। वैसे तो, रीता जोशी और दिग्विजय सिंह दोनों ही राहुल बाबा के सुरक्षा कवच बनने की कोशिश भर कर रहे थे। लेकिन, कांग्रेस की असली बीमारी यही है। यहां बोलने वाले नेता बहुत ढेर सारे हैं। इतने कि मंच टूट जाते हैं लेकिन, मंच के नीचे नेताओं को सुनने के लिए कार्यकर्ता नहीं मिलते।
कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में एक और बड़ी बीमारी है। इस राज्य में कांग्रेस के बहुत बड़े-बडे नेता हैं। हर शहर में ये नेता दूसरी किसी भी पार्टी के नेता से मजबूत हैं। इनके पास कार्यकर्ता भी हैं। लेकिन, वो कार्यकर्ता कांग्रेस के लिए सिर्फ अपने नेताजी को मजबूत करने के लिए काम करता है। अपने नेता को मजबूत करने के इसी चक्कर में अक्सर एक बडे कांग्रेसी नेताजी के कार्यकर्ता दूसरे बड़े कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ भिड़ जाते हैं। ऐसा भिड़ते हैं कि कांग्रेस कमजोरी हो जाती है।
नई-नवेली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के अपने शहर इलाहाबाद में तो ये आम बात है। विधानमंडल दल के नेता प्रमोद तिवारी, पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक बाजपेयी और रीता जोशी के समर्थकों के बीच अकसर किसी राष्ट्रीय नेता के सामने अपनी हैसियत दिखाने के लिए मारपीट हो जाती थी। अच्छा हुआ कि रीता के चिर प्रतिद्वंदी अशोक बाजपेयी अब बसपा में मायावती जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। और, इलाहाबाद से ही लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं।
राहुल गांधी को शायद उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की असली हैसियत का अंदाजा और इसे फिर से मजबूत करने में आने वाली असली मुश्किल भी पता चल गई होगी। इसीलिए जाते-जाते राहुल ने कहा- हमें अपनी पार्टी के भीतरघातियों से सबसे ज्यादा परेशानी हो सकती है। अब अगर ये बात प्रदेश के बड़े कांग्रेसियों की समझ में आती है तो, शायद राहुल की उत्तर प्रदेश योजना लोकसभा चुनावों में कुछ असर कर पाए। क्योंकि, रीता बहुगुणा जोशी और दिग्विजय सिंह लोगों को जोड़ने और राजनीतिक जोड़-तोड़ की बेजोड़ क्षमता तो रखते ही हैं।

2 comments:

अनुनाद सिंह said...

ये कहना गलत है कि राहुल को बोलना नहीं आता! असल बात यह है कि उनको सोचना नहीं आता। विचार शक्ति में पूर्णत: विपन्न हैं।

बूड़ा बंश कबीर का उपजा पूत कमाल!!!

Mrs. Asha Joglekar said...

ऱाहुल गांधी को बोलना और सोचना शायद न आता हो वे अपने काम को सच्चे दिल से करना चाहते हैं
और सही हालात को भी समझते हैं जो कि बडे दिग्गजों में अभाव से ही नजर आता हे । हालात को जब तक स्वीकारोगे नही सुधारोगे कैसे ?