दिल्ली पुलिस इन दिनों बड़े-बड़े कारनामे कर रही है। बड़े-बड़े भगोड़े बदमाशों को दिल्ली पुलिस धर दबोच रही है, सलाखों के पीछे पहुंचा दे रही है। खासकर उत्तर प्रदेश के भगोड़े बदमाशों के लिए तो दिल्ली पुलिस काल बन गई है। इधर की खबरों को देखकर पहली नजर में तो ऐसा ही लगता है। दो दशक से भगोड़े पांच लाख के इनामी बदमाश बृजेश सिंह के बाद इलाहाबाद का कुख्यात भगोड़ा माफिया सांसद भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में आ गया है।
लेकिन, एक बड़ा इत्तफाक दिख रहा है जिससे सवाल भी खड़े हो सकते हैं कि आखिर उत्तर प्रदेश के अपराधी दिल्ली पुलिस की ही पकड़ में क्यों आ रहे हैं। बृजेश सिंह के भुवनेश्वर से पकड़े जाने के बाद जब अतीक अहमद दिल्ली से पकड़े गए तो, मुझे लगने लगा कि कहीं मायावती सही तो, नहीं कह रही थी। मायावती ने कुछ दिन पहले ही प्रेस कांफ्रेंस करके कहा था कि समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुना गया भगोड़ा सांसद अतीक अहमद उनकी हत्या करने की फिराक में हैं। और केंद्र की कांग्रेस सरकार उसकी मदद कर रही है। वैसे तो इतनी तगड़ी सिक्योरिटी में रहने वाली मुख्यमंत्री को कोई अपराधी कैसे मार सकता है। लेकिन, आरोप जब मुख्यमंत्री खुद लगा रही हो तो, उस पर कुछ तो यकीन करना ही पड़ता है।
वैसे मायावती का अतीक से डरना बेवजह नहीं है। मायावती को लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में समाजवादी पार्टी के रमाकांत, उमाकांत यादव और अतीक अहमद की बदसलूकी आज भी डराती होगी। वैसे जब मायावती ने अतीक से अपनी जान का खतरा बताया तो, पहले से ही उत्तर प्रदेश से भगोड़ा घोषित किए जा चुके अतीक की पुलिस मुठभेड़ में हत्या की आशंका बलवती हो गई। लेकिन, न तो कल्याण सिंह का जमाना था और न ही अतीक अहमद, शिव प्रकाश शुक्ला की तरफ सिर्फ अपराधी था। अतीक माननीय सांसद हैं और आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, सपा के लिए काम की ताकत बन सकते हैं। अब अगर दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद भी अतीक जैसा बदमाश मुस्कुराते हुए मुख्यमंत्री पर आरोप लगाकर मजे से जेल जा सकता है तो, मारे गए बीएसपी विधायक राजू पाल की विधवा पूजा पाल और राजू की मां रानी पाल का डरना तो बेवजह नहीं ही है। उनके पास तो मुख्यमंत्री जैसी सुरक्षा भी नहीं है। राजू पाल हत्याकांड में गवाह उमेश की तो जैसे सांस ही रुक गई है।
अतीक का दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में आना कई सवाल खड़े करता है। क्या उत्तर प्रदेश पुलिस में अतीक का जाल इतना मजबूत हो चुका है कि अतीक की सारी बातचीत रिकॉर्ड होने के बाद भी पुलिस उसे पकड़ नहीं सकी। कहते हैं कि फरारी में अतीक ने 65 से ज्यादा सिमकार्ड इस्तेमाल किए। अतीक का भाई अशरफ और हमजा अभी भी पुलिस की पकड़ में नहीं आए हैं। साफ है माहौल ठीक होते ही ये दोनों भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त से यूपी की जेल में महफूज हो जाएंगे। अतीक ने दिल्ली पुलिस (मुझे साफ मिलीभगत लगती है) को खुद को सौंपने से पहले दिल्ली में टीवी चैनलों को जिस ठाट से इंटरव्यू दिया था वो, देखने लायक था। साफ दिख रहा था कि दिल्ली में किसी सांसद आवास पर इंटरव्यू दिया गया था।
एक और बात छोटे-छोटे मामलों में आजकल पुलिस अपराधियों से सच उगलवाने के लिए नारको टेस्ट का सहारा लेने लगी है। फिर अतीक को इससे क्यों बख्शा जा रहा है। साफ है अगर बेहोशी में अतीक ने सारी सच्चाई उगली तो, राजू पाल का हत्यारा साबित होने के साथ वो कई बड़े नेताओं और उत्तर प्रदेश पुलिस के कई बड़े अफसरों को भी नाप लेगा। इलाहाबाद शहर और अतीक के संसदीय क्षेत्र फूलपुर में तो सबकी बोलती सी बंद हो गई है। सब कह रहे हैं कि जेल में बैठा अतीक तो अब वहीं से किसी की भी हत्या करवा सकता है। अब सोचिए कि मायावती क्या कर लेंगी अगर सपा और कांग्रेस दोनों को अतीक नेता लग रहे हैं अपराधी नहीं। मुझे तो लगता है कि मायावती सच ही कह रही हैं कि केंद्र की कांग्रेस सरकार भी अतीक की मदद कर रही है। और, अगले लोकसभा चुनाव में नेहरू-गांधी की विरासत की मलाई खा रही सोनिया अम्मा की कांग्रेस अतीक अहमद को नेहरू जी की लोकसभा सीट फूलपुर से अपना प्रत्याशी बना सकती है। जीतने में कोई दिक्कत तो है ही नहीं।
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Wednesday, February 6, 2008
Thursday, January 24, 2008
उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा इनामी पकड़ में आने का मतलब

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े इनामी माफिया को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। भुवनेश्वर के बिग बाजार के बाहर से धरे गए बृजेश सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच लाख रुपए का इनाम रखा था। बृजेश बराबर का ही इनामी ददुआ डाकू था जिसे मायावती की सरकार बनने के बाद पुलिस ने बांदा के जंगलों में मार गिराया। लेकिन, करीब दो दशकों से सारी मशक्कत के बाद भी उत्तर प्रदेश पुलिस को बृजेश सिंह का सुराग तक नहीं मिल सका। अब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बृजेश सिंह को खोज निकाला है। गायब रहकर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में बृजेश सिंह का आतंक इतना बड़ा था कि उस पूरे इलाके में रेलवे और दूसरे सरकारी ठेकों से लेकर कोयले तक की दलाली में बृजेश सिंह का सिक्का चलता था।
वैसे बृजेश सिंह के गायब होने की एक बड़ी वजह ये भी थी कि बृजेश पूर्वी उत्तर प्रदेश में यहां के दूसरे माफिया और विधायक मुख्तार अंसारी के हाथों बुरी तरह पिट गया था। यही वजह थी कि बृजेश ने राजनीतिक शरण के रास्ते तलाशने शुरू कर दिए थे। अपने भाई चुलबुल सिंह को बीजेपी में घुसाया। चुलबुल बनारस जिला पंचायत के अध्यक्ष बन गए। फिर भतीजा बसपा के टिकट पर पहले ब्लॉक प्रमुख और अब विधायक बन चुका है।
बृजेश गिरोह के ज्यादातर बड़े अपराधियों की या तो हत्या हो चुकी है। या फिर वो चुपचाप राजनीतिकी छतरी तानकर किसी तरह अपना जीवन चला रहे हैं। बृजेश सिंह के खासमखास अवधेश राय की हत्या होने के बाद उनके छोटे भाई अजय राय विधायक हो गए और मुख्तार से लड़ाई लड़ने के बजाए सिर्फ अपनी इज्जत बचाने में ही लगे रहे। कृष्णानंद राय जैसे लोग भी थे जो, बीजेपी से विधायक चुने जाते रहे और बृजेश गिरोह की अघोषित रूप से कमान संभाले हुए थे। लेकिन, आरोप है कि मुख्तार अंसारी ने ही कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी। मुख्तार के गृह जिले गाजीपुर में ही कृष्णानंद राय का चुनौती बने रहना मुख्तार को कैसे बर्दाश्त हो सकता था। बनारस में हुई अवधेश राय की हत्या में भी मुख्तार पर आरोप है।
आमतौर पर लोगों को बृजेश और मुख्तार की दुश्मनी ही लोगों को याद है। लेकिन, दरअसल बृजेश के अपराधी बनने की शुरुआत आजमगढ़ की बाजार में बृजेश के पिता की हत्या होने से हुई थी। जब दूसरे दबंग ठाकुरों ने बृजेश के पिता को गोली मारकर और चाकुओं से छलनी कर हत्या कर दी थी। उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के दो बदमाशों हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही की दुश्मनी खुलेआम चलती थी। हरिशंकर तिवारी ब्राह्मण और वीरेंद्र शाही ठाकुर बदमाशों के सरगना जैसे काम करते थे। उसी में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी का उदय हुआ।
चढ़ी रंगबाजी के समय बृजेश सिंह ने बहुत तेजी से पूरे उत्तर प्रदेश में अपना जाल फैला लिया। बिहार में तब वीरेंद्र सिंह टाटा की अच्छी गुंडागर्दी चलती थी। बृजेश सिंह और वीरेंद्र टाटा ने अच्छा कॉकस बना लिया था। जिससे चंदौसी की कोयला खदानों से लेकर बोकारो और जमशेदपुर तक इन लोगों की तूती बोलने लगी। कोयले की कमाई के अलावा रेलवे, पीडब्ल्यूडी और दूसरे सरकारी विभागों की ठेकेदारी इन लोगों की कमाई का मुख्य जरिया था। बृजेश सिंह का नाम मुंबई के जेजे अस्पताल गोलीकांड में भी आया था। लेकिन, इन सबके बावजूद बृजेश ज्यादातर अंडरग्राउंड ही रहता था। वो, लोगों के सामने नहीं आता था। उसकी यही मजबूती धीरे-धीरे कमजोरी बनती गई।
मुख्तार जेल में होता या फिर बाहर जबकि, बृजेश अंडरग्राउंड रहकर ही गिरोह चला रहा था। इस बीच मुख्तार और बृजेश गिरोह के बीच कई बार आमने-सामने गोलियां चलीं। एक बार तो बृजेश सिंह ने गिरोह के साथ गाजीपुर जेल में बंद मुख्तार अंसारी पर गोलियां चलाईं। लेकिन, धीरे-धीरे मुख्तार अंसारी का पलड़ा भारी होता गया। बनारस में अवधेश राय की हत्या के बाद बृजेश सिंह इस क्षेत्र में काफी कमजोर हो गया। इसी बीच हरिशंकर तिवारी के ही तैयार किए लड़के गोरखपुर में उन्हें चुनौती देना शुरू कर चुके थे। 1995 आते-आते गोरखपुर में शिव प्रकाश शुक्ला, आनंद पांडे और राजन तिवारी का गिरोह हरिशंकर तिवारी को उन्हीं के गढ़ में चुनौती देने लगा।
हरिशंकर तिवारी से सीखने वाले ये लड़के इतने मनबढ़ थे कि वो, अकेले बादशाह बनना चाहते थे। उनके निशाने हर वो बदमाश था जिसकी हत्या करने से उनका कद बढ़ जाता। पहले इन मनबढ़ लड़कों के शिकार गोरखपुर के छोटे-मोटे बदमाश हुए। फिर कई बार की कोशिश के बाद इन लोगों ने वीरेंद्र शाही की लखनऊ में हत्या कर दी। शिव प्रकाश शुक्ला हरिशंकर तिवारी को मारकर उन्हीं की विधानसभा चिल्लूपार से चुनाव लड़ने की तैयारी में था। लेकिन, आनंद पांडे की वजह से शिव प्रकाश की य हसरत परवान नहीं चढ़ की।
लेकिन, इन लड़कों के मुंह खून लग चुका था। हर एक हत्या के बाद इनके पास पैसा और बदमाशों वाली इज्जत बढ़ती जा रही थी। बिहार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हॉस्पिटल में हत्या, इलाहाबाद में जवाहर पंडित की दिनदहाड़े व्यस्त बाजार सिविल लाइंस में हत्या, बनारस से मिर्जापुर के रास्ते में वीरेंद्र टाटा की हत्या, लखनऊ में गोरखपुरे के एक नेता पर होटल में घुसकर चलाई गई गोलिया और दूसरी कई हत्याएं एक के बाद एक हुईं और सबमें शिव प्रकाश शुक्ला, आनंद पांडे और राजन तिवारी गिरोह का ही नाम आया। कहा जाता है कि इन लोगों ने लखनऊ में मुख्तार अंसारी के काफिले का भी पीछा किया था लेकिन, मुख्तार भाग निकलने में सफल रहा। कहा ये भी जाता है कि प्रतापगढ़ के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह से ये वसूली करने में कामयाब भी हो गए थे।
इनका दिमाग खराब हुआ तो प्रदेश के सारे माफिया इन नए लड़कों के गिरोह के दुश्मन बन गए। और, पुलिस को इनके छिपने के ठिकाने के बारे में जानकारी देनी शुरू कर दी। इसी बीच ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या में साक्षी महाराज और विजय सिंह का नाम आया तो, इस गिरोह ने साक्षी महाराज को निशाना बनाने की कोशिश की। लेकिन, इससे पहले कि वो सफल होते, साक्षी महाराज ने अपनी और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जान को शिव प्रकाश शुक्ला से खतरा बताकर पुलिस मशीनरी की इज्जत दांव पर लगा दी। फिर क्या था पहले एक-एक कर इस गिरोह के शूटर लड़के मारे गए। फिर आनंद पांडे और फिर शिव प्रकाश शुक्ला को पुलिस ने मार गिराया।
कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते बड़े पैमाने पर बदमाशों के पुलिस एनकाउंटर के बाद कई सालों तक उत्तर प्रदेश में संगठित अपराधी छिपते-छिपाते ही अपराध कर रहे थे। लेकिन, फिर धीरे-धीरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में दूसरे बदमाशों का गिरोह तैयार हो गया। गाजीपुर में मुख्तार अंसारी, इलाहाबाद में अतीक अहमद और प्रतापगढ़ में रघुराज प्रताप सिंह अपनी जड़ें मजबूत कर चुके थे। मुलायम सिंह यादव के शासन में इन तीनों की ही तूती बोलती थी। फिर भी ये अपने क्षेत्रों से बाहर बहुत दखल नहीं देते थे। इस वजह से उत्तर प्रदेश में आम लोग दहशत में नहीं थे।
अब बृजेश सिंह पकड़ा जा चुका है। बृजेश के पहले ही राजनीतिक आत्मसमर्पण की बातें हो रही थीं। और, कहा भी जा रहा है कि बीजेपी और बीएसपी के जरिए वो खुद को बचाए रखने में कामयाब हो पा रहा था। लेकिन, अब बृजेश सबके सामने होगा। कानून की पेचीदगियों के लिहाज से बृजेश को जमानत भी मिल सकती है। या फिर वो लंबे समय लिए जेल में होगा। साफ है जिस बृजेश का किसी ने जब चेहरा नहीं देखा था और उसकी आतंक से कमाई चल रही थी तो, उसके सामने आने के बाद की स्थिति का अंदाजा साफ लगाया जा सकता है। बृजेश बहुत कमजोर हो चुका है और सपा की सरकार न होने से मुख्तार अंसारी को भी प्रशासन से बहुत मदद नहीं मिलने वाली है। लेकिन, दोनों के बीच एक बार फिर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के अंडरग्राउंड साम्राज्य पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो सकती है।
Saturday, January 5, 2008
अब भी समझ जाओ भइया नहीं तो बड़ी मुश्किल होगी
देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि किसी सांसद के खिलाफ पुलिस ने अपराधियों की तरह स्केच जारीकर उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। माननीय (मुझे ये लिखते हुए शर्म आ रही है) सांसदों की सुरक्षा के लिए लगी रहने वाली पुलिस एक सांसद की तलाश में पिछले कई महीनों से घूम रही है। सफलता नहीं मिली तो, सांसद के चेहरे के सात संभव तरीके वाले स्केच जारी किए।
ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।
अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।
लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।
25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।
उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।
सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।
फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।
ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।
अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।
लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।
25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।
उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।
सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।
फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।
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